अश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा में सोमवार को कलश स्थापना के साथ शरदीय नवरात्रि शुरू हुई, जिसके साथ 2 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी..
इस बार नवरात्र 10 दिनों का होगा..पंचांग की गणना और तिथियों के क्रम के कारण ऐसा संयोग बना है..
चतुर्थी तिथि 25 और 26 अक्टूबर दो दिनों की है इसलिए ऐसा संयोग बना है..ऐसा संयोग 9 साल बाद 2016 के बाद बना है..
नवरात्रि, नौ रातों का एक दिव्य उत्सव, माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा का पर्व ..
यह त्यौहार पूरे भारत में बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है.
हर दिन माँ के एक अलग रूप की पूजा की जाती है, और पहले दिन का विशेष महत्व है क्योंकि यह देवी शैलपुत्री को समर्पित है.

शैलपुत्री: पर्वतराज हिमालय की पुत्री
संस्कृत में ‘शैल’ का अर्थ है पर्वत और ‘पुत्री’ का अर्थ है बेटी. इस प्रकार, शैलपुत्री का शाब्दिक अर्थ है “पर्वत की बेटी”. देवी शैलपुत्री, माता पार्वती का ही एक रूप हैं, जिनका जन्म पर्वतराज हिमालय के घर हुआ था.
उनके इस रूप में, देवी शैलपुत्री के माथे पर आधा चाँद सुशोभित है, उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल है और बाएं हाथ में कमल का फूल है. वह नंदी नामक वृषभ पर विराजमान होती हैं. यह रूप शांति, सरलता और पवित्रता का प्रतीक है.
पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी सती ने जब अपने पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अपने पति भगवान शिव का अपमान होते देखा, तो उन्होंने स्वयं को योगाग्नि में भस्म कर लिया.
अगले जन्म में, उन्होंने पर्वतराज हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया. शैलपुत्री के रूप में ही उन्होंने घोर तपस्या की और भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त किया.
पहले दिन माता की आराधना कैसे करें..
नवरात्रि के पहले दिन, कलश स्थापना के साथ देवी शैलपुत्री की पूजा की जाती है. भक्तजन सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं, स्वच्छ वस्त्र पहनते हैं और पूजा की तैयारी करते हैं.
शैलपुत्री की पूजा से मिलने वाले लाभ
यह माना जाता है कि देवी शैलपुत्री की पूजा करने से भक्तों को स्थिरता, धैर्य और शक्ति प्राप्त होती है. वे जीवन की सभी चुनौतियों का सामना करने के लिए मजबूत बनते हैं. यह दिन हमें प्रकृति, खासकर पर्वत की स्थिरता और दृढ़ता का महत्व सिखाता है





