जीविका दीदी अपने आप में परिचित नाम है जिससे पूरा भारत रू- ब-रू है, बिहार से शुरू हुआ यह परियोजना कैसे पूरे भारत में फैला, जिसने न सिर्फ महिलाओं को आर्थिक तौर पर स्वतन्त्र बनाया साथ ही सामाजिक और राजनीतिक पहचान भी दिलाई….

अब हम जानते है जीविका दीदी उत्थान में नीतीश कुमार की भूमिका…..
नीतीश कुमार ने बिहार में बिहार ग्रामीण जीविकोपार्जन प्रोत्साहन समिति (जीविका) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब परिवारों को सशक्त बनाना और उनकी आजीविका में सुधार करना है। इस पहल के माध्यम से महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों (SHGs) से जोड़ा गया, जिससे वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकीं।
- नीतीश कुमार ने 2006 में मुख्यमंत्री बनने के बाद जीविका परियोजना की शुरुआत की। इस परियोजना का मुख्य लक्ष्य महिलाओं को संगठित करके उन्हें सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त बनाना था।
- उन्होंने स्वयं सहायता समूहों को प्रोत्साहित किया, जहाँ महिलाएँ एक साथ आकर छोटी बचत करती हैं और ज़रूरत पड़ने पर एक-दूसरे को ऋण देती हैं। यह मॉडल ग्रामीण महिलाओं को साहूकारों के उच्च ब्याज से बचाता है और उन्हें अपनी छोटी-मोटी ज़रूरतों के लिए बैंक पर निर्भर रहने की बजाय आपस में सहयोग करने के लिए प्रेरित करता है।
- जीविका दीदियों ने न केवल बचत की, बल्कि विभिन्न प्रकार के छोटे-बड़े व्यवसाय भी शुरू किए, जैसे अचार बनाना, सिलाई, और हस्तशिल्प।
- जीविका ने केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव भी लाए। जीविका ने शराबबंदी, स्वच्छता अभियान और शिक्षा जैसे सामाजिक मुद्दों में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई..
- मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में जीविका दीदियों को विभिन्न सरकारी योजनाओं, जैसे मनरेगा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), से भी जोड़ा गया। इससे उनकी पहुँच सरकारी लाभों तक आसान हुई और वे योजनाओं के कार्यान्वयन में भी भागीदारी करने लगीं।
बिहार में ग्रामीण गरीबी को बताने और महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए, बिहार सरकार द्वारा बिहार ग्रामीण जीविकोपार्जन प्रोत्साहन समिति (जीविका), जिसे बिहार ग्रामीण आजीविका मिशन (BRLPS) के रूप में भी जाना जाता है, की स्थापना की गई ।
इस परियोजना का प्राथमिक उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करने वाली गरीब महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाना है । जीविका ने ग्रामीण बिहार में 1.27 करोड़ से अधिक परिवारों को सीधे जोड़कर उनके जीवन में एक नया अध्याय जोड़ा है ।
जीविका दीदी परियोजना ने कैसे महिलाओं को निष्क्रिय लाभार्थियों से सामाजिक बदलाव के प्रभावी वाहकों में बदल दिया है । जीविका दीदियों द्वारा किए गए जागरूकता प्रयासों की व्यापकता और गहराई का मूल्यांकन करना है, कैसे उन्होंने सामजिक, आर्थिक साथ ही स्वास्थ्य समेत अन्य क्षेत्रों में महिलाओं को प्रेरित किया है…
जीविका परियोजना का आधार स्वयं सहायता समूह (SHG) मॉडल है, जिसमें 10-12 समान आर्थिक और सामाजिक स्तर की गरीब महिलाओं को संगठित किया जाता है । इस संगठनात्मक संरचना के माध्यम से महिलाओं को सबसे पहले व्यक्तिगत पहचान और साक्षरता का पहला पैमाना यानी अपना हस्ताक्षर करना सिखाया जाता है ।
समूह गठित होने के बाद, सदस्य हर सप्ताह एक तय राशि की बचत करते हैं, जिससे एक सामूहिक निधि का निर्माण होता है। इस निधि का उपयोग आपस में लेनदेन के लिए किया जाता है । यह प्रक्रिया न केवल उनमें स्वच्छ बैंकिंग की आदत विकसित करती है, बल्कि उन्हें महंगे कर्जों के लिए महाजनों के चंगुल से भी मुक्त करती है ।
इन समूहों के ऊपर ग्राम संगठन (VO) और संकुल स्तरीय संगठन (CLF) जैसे उच्चतर सामुदायिक संगठनों का भी निर्माण किया गया है । ये संगठन समूहों की पूंजी की जरूरत को पूरा करते हैं, वित्तीय अनुशासन बनाए रखते हैं और निर्णय लेने की क्षमता का विकास करते हैं, जिससे वे समय के साथ एक स्वतंत्र इकाई के रूप में कार्य कर सकें ।
1.2 वित्तीय समावेशन और बैंक लिंकेज: सशक्तिकरण की नींव
जीविका के तहत, स्वयं सहायता समूहों को शुरुआती पूंजीकरण निधि (ICF) के रूप में 30,000 रुपये से 1,00,000 रुपये तक और परिक्रमी निधि (Revolving Fund) के तौर पर 30,000 रुपये प्रदान किए जाते हैं । इसके बाद, समूह बैंकों से जुड़कर अपनी पूंजी को बढ़ाते हैं। सितंबर 2023 तक, 10.47 लाख स्वयं सहायता समूहों का गठन हो चुका था, जिनमें से 9.69 लाख समूहों का बैंक खाता खुल चुका है । जीविका ने बैंकों से कुल 34,500 करोड़ रुपये से अधिक का ऋण लिया है , बैंकों में जीविका समूहों की ऋण वापसी की दर काफी अच्छी है ।
वित्तीय स्वतंत्रता ने महिलाओं को अपने परिवार और समाज में सम्मान और निर्णय लेने की शक्ति प्रदान की है । जब महिलाएं आर्थिक रूप से परिवार के भरण-पोषण में योगदान करने लगती हैं, तो उनका सामाजिक सम्मान स्वाभाविक रूप से बढ़ता है और उन्हें अपनी बात रखने का अधिकार मिलता है । यह बढ़ा हुआ सम्मान और आत्मविश्वास ही वह आधार है जो उन्हें सामाजिक कुरीतियों जैसे दहेज और घरेलू हिंसा के खिलाफ जागरूकता फैलाने और निर्णायक भूमिका निभाने में सक्षम बनाता है ।
सूक्ष्म-उद्यमों का विकास(MSME)
जीविका ने ग्रामीण महिलाओं को मछली पालन, मधुमक्खी पालन, ब्यूटी पार्लर संचालन, और कृषि कार्यों के लिए ड्रोन प्रशिक्षण जैसे विभिन्न क्षेत्रों में उद्यमी बनने के लिए प्रेरित किया है । ‘लखपति दीदी’ योजना के तहत, 30.21 लाख महिलाओं को वार्षिक ₹1 लाख से अधिक की आय दिलाने का लक्ष्य रखा गया है ।
जीविका दीदियां अब सिर्फ ग्रामीण उद्यमी नहीं हैं, बल्कि विभिन्न सरकारी और निजी क्षेत्रों में सेवा प्रदाता भी हैं। वे अस्पताल, स्कूल और सरकारी कार्यालयों में ‘दीदी की रसोई’ नामक कैंटीन चला रही हैं, जिससे लोगों को शुद्ध और पौष्टिक भोजन उपलब्ध हो रहा है ।
इस मॉडल की सफलता के कारण पंजाब, कर्नाटक और गुजरात जैसे राज्यों ने भी इसमें दिलचस्पी ली है ।
इसके अतिरिक्त, जीविका दीदियां ‘बैंक सखी’ के रूप में ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राहक सेवा केंद्र (CSP) संचालित कर रही हैं, जिससे उन क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाएँ उपलब्ध हो रही हैं..





