सुप्रीम कोर्ट ने आज चुनाव आयोग से बड़ा जवाब मांगा है। कोर्ट ने आयोग को निर्देश दिया है कि वह उन 3.66 लाख मतदाताओं का पूरा ब्योरा पेश करे, जिनके नाम हाल ही में वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं। अदालत ने कहा कि मतदाता सूची में किसी भी व्यक्ति का नाम हटाना एक गंभीर मामला है, और इसमें पारदर्शिता और प्रक्रिया की शुद्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
क्या है मामला..
हाल ही में कई राज्यों से ऐसी शिकायतें सामने आई थीं कि हजारों मतदाताओं के नाम बिना सूचना के मतदाता सूची से हटा दिए गए। इसके बाद कुछ नागरिक संगठनों और राजनीतिक दलों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। उनका कहना था कि आयोग ने “डुप्लिकेट या मृत मतदाता” के नाम हटाने की प्रक्रिया में सक्रिय मतदाताओं के नाम भी हटा दिए, जिससे लोकतांत्रिक अधिकार प्रभावित हुआ।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संजय करोल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा —“यदि किसी नागरिक का नाम मतदाता सूची से हटाया गया है, तो उसे इसके पीछे का कारण जानने का अधिकार है। चुनाव आयोग को यह बताना होगा कि यह प्रक्रिया किस आधार पर और किन मापदंडों पर की गई।”
कोर्ट ने चुनाव आयोग से दो सप्ताह में विस्तृत रिपोर्ट देने को कहा है, जिसमें यह स्पष्ट किया जाए कि —
किन राज्यों से और किन कारणों से नाम हटाए गए,
क्या प्रभावित मतदाताओं को पहले से सूचित किया गया था,
और क्या उनके पास नाम पुनः शामिल कराने का विकल्प उपलब्ध था।
चुनाव आयोग ने अपना पक्ष रखते हुए अदालत को बताया कि मतदाता सूची को अद्यतन करने की प्रक्रिया नियमित और तकनीकी रूप से जांची हुई है। आयोग ने कहा कि हटाए गए नामों में अधिकांश दोहराए गए, मृत या स्थानांतरित मतदाता हैं। फिर भी आयोग ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराएगा।
विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर चुनाव आयोग से जवाबदेही की मांग की है। उनका कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाया जाना “चुनाव से पहले मताधिकार को प्रभावित करने” का मामला हो सकता है। वहीं नागरिक अधिकार समूहों ने सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप का स्वागत करते हुए कहा कि यह फैसला लोकतंत्र और पारदर्शिता को मजबूत करेगा।
🔹 सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद करेगा, जब चुनाव आयोग अपनी रिपोर्ट दाखिल करेगा। तब अदालत तय करेगी कि आगे की कार्रवाई , जैसे नाम पुनर्स्थापन या प्रक्रिया में बदलाव की आवश्यकता है या नहीं।





