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अधर्म पर धर्म की विजय ,असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक दशहरा.., बुराई चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अच्छाई की हमेशा विजयी होती है….

असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक दशहरा..

दशहरा, जिसे विजयदशमी भी कहा जाता है, भारत का एक महान पर्व है जो असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। यह पर्व आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को मनाया जाता है और नवरात्रि के दस दिनों की साधना और उपासना का समापन होता है ..

दशहरा के दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध कर के धर्म की रक्षा की थी। रावण का वध केवल बुराई का अंत ही नहीं था, बल्कि यह संदेश भी था कि चाहे अधर्म कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः विजय धर्म और सत्य की ही होती है। भारत के कई हिस्सों में इस दिन रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले जलाए जाते हैं, जो बुराई के दहन का प्रतीक हैं।

अधर्म पर धर्म की विजय

दशहरा हमें यह सिखाता है कि जीवन में किसी भी प्रकार की नकारात्मकता, अहंकार, क्रोध और अन्य दोषों को त्यागकर अच्छाई, संयम और सदाचार के मार्ग पर चलना चाहिए। यह पर्व लोगों को साहस, नैतिकता और सकारात्मकता की प्रेरणा देता है।

विजयदशमी केवल धार्मिक उत्सव ही नहीं है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है। इस दिन लोग एक-दूसरे को बधाइयाँ देते हैं और परिवार, मित्रों के साथ आनंद मनाते हैं।

अच्छाई की हमेशा विजयी होती है....
अच्छाई की हमेशा विजयी होती है….

दशहरा क्यों मनाते हैं?

प्राचीन काल में लंका का राजा रावण बहुत विद्वान, बलशाली और महापंडित था। लेकिन अपने घमंड और अहंकार के कारण उसने कई गलत काम किए। सबसे बड़ा पाप उसने तब किया जब उसने माता सीता का हरण किया।भगवान श्रीराम, अपने भाई लक्ष्मण और भक्त हनुमान जी की सेना के साथ लंका पहुँचे। वहाँ राम और रावण के बीच भीषण युद्ध हुआ। कई दिनों तक युद्ध चलता रहा।

अंततः आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को भगवान श्रीराम ने रावण का वध कर दिया। रावण के साथ उसका भाई मेघनाद और विशालकाय कुंभकर्ण भी मारे गए।रावण के वध के साथ ही..

[ ] सत्य की जीत हुई,

[ ] अधर्म का अंत हुआ,

[ ] हमें शिक्षा मिली कि अहंकार और अन्याय का अंत निश्चित है….

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