चीन के तियानजिन शहर में SCO सम्मेलन में भारत रूस और चीन की जुगलबंदी छाई रही..
SCO शिखर सम्मेलन 31 अगस्त से 1 सितंबर, 2025 तक चीन के तियानजिन शहर में आयोजित हुआ था।
तीनों नेता ने आपसी सुर से आपसी सहयोग और रिश्ते मजबूत करने पर जोर दिया
प्रधानमंत्री मोदी और रूसी राष्ट्रपति पुतिन के बीच द्विपक्षीय वार्ता हुई..पीएम मोदी और रूसी राष्ट्रपति पुतिन के बीच कार में 45 मिनट तक महत्तवपूर्ण बातें हुईं..
भारतीय प्रधानमंत्री ने भारत पर 50% टैरिफ के बीच SCO बैठक में कहा:
“भारत और रूस हमेशा से कंधे से कंधे मिलाकर रहे है ,साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया की मानवता के खातिर यूक्रेन युद्ध का अब शांतिपूर्ण हल हो जाना चाहिए “
- मोदी ने रूसी राष्ट्रपति को कहा कि भारत की 140 करोड़ जनसंख्या भारतीय पुतिन के स्वागत को उत्सुक है…
- इस बीच रूसी डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट फंड के CEO किरील दिमित्रयेव ने बड़ा एलान किया,उन्होंने कहा जल्द ही भारत में रूस की ओर से बड़ा निवेश किया जाएगा..दोनों देशों के बीच चर्चा कर इसे फाइनल किया जाएगा..
- पीएम मोदी देर शाम वहां से भारत लौटे..
SCO बैठक ने ट्रम्प के टैरिफ पर कैसे प्रभाव डाला है:
- एससीओ सदस्य देशों ने अमेरिका की टैरिफ नीति को “संरक्षणवादी” और “एकतरफा” बताते हुए उसकी निंदा की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वैश्विक व्यापार को प्रभावित करने वाले एकतरफा टैरिफ के बजाय, आपसी सहयोग और बहुपक्षीय व्यापार को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
- एससीओ बैठक में सदस्य देशों ने एक-दूसरे के साथ अपनी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करने पर जोर दिया। इसका उद्देश्य अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करना और अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को कम करना है।
- कुछ विश्लेषकों का मानना है कि एससीओ की यह बैठक ट्रम्प के व्यापार युद्ध के जवाब में थी। ट्रम्प प्रशासन द्वारा भारत पर हाल ही में 50% तक के ऊंचे टैरिफ लगाए गए थे, जिसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका थी। ऐसी स्थिति में, भारत ने चीन और रूस के साथ अपने संबंधों को मजबूत करके अमेरिका को एक स्पष्ट संदेश दिया कि वह उसकी “दादागिरी” स्वीकार नहीं करेगा।
- एससीओ (शंघाई सहयोग संगठन) की बैठक पर विदेशी मीडिया की प्रतिक्रिया काफी मिली-जुली रही है, लेकिन कुछ प्रमुख बातें उभरकर सामने आई हैं:
अमेरिकी मीडिया में चिंता और निराशा
- अमेरिकी मीडिया में इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है कि भारत, चीन और रूस जैसे देशों के नेता एक ही मंच पर एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं। द वाशिंगटन पोस्ट, न्यूयॉर्क टाइम्स और एसोसिएटेड प्रेस जैसे प्रमुख अमेरिकी अखबारों ने इस बैठक को “अमेरिका के खिलाफ चीन की नई कूटनीतिक मुहिम” के रूप में देखा है।
- अमेरिकी मीडिया ने ट्रम्प प्रशासन की टैरिफ नीतियों को इस निकटता का एक प्रमुख कारण बताया है। कई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए ऊंचे टैरिफ ने भारत को चीन और रूस जैसे वैकल्पिक साझेदारों की ओर धकेल दिया है।
- कुछ विश्लेषकों ने इस बैठक को “रिवर्स निक्सन” रणनीति के रूप में वर्णित किया है। उनका मानना है कि ट्रम्प ने चीन को अलग-थलग करने के लिए रूस के साथ संबंध सुधारने की कोशिश की, लेकिन इसके बजाय पुतिन ने चीन और भारत दोनों के साथ अपनी निकटता बढ़ा ली, जिससे अमेरिका के लिए स्थिति और जटिल हो गई।
- अमेरिकी मीडिया ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा “बदमाशी” और “एकतरफा व्यवहार” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने पर भी ध्यान दिया है, जिसे व्यापक रूप से वाशिंगटन पर लक्षित माना गया है।
चीनी और रूसी मीडिया में विजय का भाव
- चीनी और रूसी मीडिया ने इस बैठक को एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में चित्रित किया है, जहां अमेरिका का प्रभुत्व चुनौती में है। उन्होंने एससीओ को नाटो जैसे पश्चिमी गठबंधनों के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया है।
- चीनी मीडिया ने विशेष रूप से मोदी और शी जिनपिंग के बीच की गर्मजोशी भरी बातचीत पर जोर दिया है। सरकारी मीडिया ने दोनों देशों के बीच संबंधों को “साझेदार, प्रतिद्वंद्वी नहीं” के रूप में वर्णित किया है और सीमा विवाद को सुलझाने की दिशा में प्रगति का संकेत दिया ..
- रूसी मीडिया ने एससीओ के बढ़ते प्रभाव को उजागर किया है, जिसमें नए सदस्यों और संवाद भागीदारों को शामिल किया गया है। उन्होंने इसे एक ऐसा मंच बताया है जो अमेरिका के एकतरफा फैसलों के खिलाफ खड़ा हो सकता है।
अन्य देशों की मीडिया की प्रतिक्रिया
- फ्रांस 24: फ्रांस के चैनल फ्रांस 24 ने एससीओ को एक ऐसे मंच के रूप में देखा है जो अमेरिका के प्रभुत्व को चुनौती दे रहा है, लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि अभी तक कोई औपचारिक सुरक्षा संधि नहीं हुई है।
- अल जज़ीरा: अल जज़ीरा ने बताया है कि ट्रम्प के व्यापार युद्ध के कारण एससीओ के सदस्य देशों को अपनी शिकायतों को व्यक्त करने का एक साझा मंच मिला है।
संक्षेप में, विदेशी मीडिया एससीओ बैठक को अमेरिका के लिए एक चुनौती के रूप में देख रही है, जो विशेष रूप से ट्रम्प की व्यापार नीतियों और एकतरफा दृष्टिकोण के कारण उत्पन्न हुई है! - वे भारत, चीन और रूस के बीच बढ़ती निकटता पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं और इसे वैश्विक शक्ति संतुलन में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देख रहे हैं।
SCO शिखर सम्मेलन के मुख्य बिंदु :-
- आतंकवाद के खिलाफ़ कार्रवाई: सभी नेताओं ने आतंकवाद की कड़ी निंदा की और कहा कि आतंकवाद को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। भारतीय प्रधानमंत्री ने “दोहरे मापदंड” (double standards) के बिना आतंकवाद के खिलाफ सख्त और समन्वित कार्रवाई
- पीएम मोदी ने शी जिनपिंग से द्विपक्षीय बातचीत की, जहाँ दोनों नेताओं ने सीमा विवादों को हल करने और सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि मतभेद को विवाद में नहीं बदलना चाहिए।
- पीएम मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच भी द्विपक्षीय बैठक हुई। मोदी ने कहा कि भारत और रूस “विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदार” हैं। दोनों नेताओं ने आर्थिक, वित्तीय और ऊर्जा क्षेत्रों में द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ाने पर संतुष्टि व्यक्त की।
- सभी नेताओं ने एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था बनाने पर जोर दिया, जिसमें किसी एक महाशक्ति का वर्चस्व न हो। शी जिनपिंग ने अमेरिका की नीतियों को “धमकाने वाला व्यवहार” बताया, और पुतिन ने कहा कि SCO एक नई वैश्विक व्यवस्था की नींव रखेगा।
- बैठक में SCO के सदस्य देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा, और तकनीकी सहयोग बढ़ाने पर भी चर्चा हुई। चीन ने SCO के लिए एक नए विकास बैंक के गठन और सदस्य देशों के लिए 2 बिलियन आरएमबी ($280 मिलियन) का अनुदान और 10 बिलियन आरएमबी ($1.4 बिलियन) का ऋण देने की घोषणा की।





