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जस्टिस वर्मा के खिलाफ़ लोकसभा में महाभियोग शुरू, इलाहाबाद जज के बंगले में कैश का मामला

जस्टिस वर्मा के खिलाफ़ लोकसभा में महाभियोग शुरू इलाहाबाद जज के बंगले में कैश का मामला

जस्टिस वर्मा के खिलाफ़ लोकसभा में महाभियोग शुरू इलाहाबाद जज के बंगले में कैश का मामला

सरकारी बंगले में अधजले नोट मिलने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट जज जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ लोकसभा में महाभियोग प्रक्रिया शुरू हो गई, मंगलवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने जस्टिस बिरला को हटाने के विभिन्न सांसदों के प्रस्ताव को स्वीकार किया…आरोपों के जाँच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की गई…इसमें सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के वरिष्ठ जज शामिल हैं….
सर्वप्रथम समिति जांच कर रिपोर्ट सौंपेगी, जिसके बाद संसद में महाभियोग प्रस्ताव पर निर्णय होगा….विदित हो कि 21 जुलाई को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और पूर्व कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद समेत 146 सांसदों ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ प्रस्ताव दिया..

आखिर हुआ क्या?

जस्टिस यशवंत वर्मा एक महत्वपूर्ण मामले से जुड़े हैं, जिसे ‘कैश कांड’ के नाम से जाना जाता है। यह मामला उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर हुई एक घटना से संबंधित है।
क्या था मामला?

  • ​मार्च 2025 में, जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में आग लग गई थी। आग बुझाने के दौरान, उनके घर के एक स्टोर रूम से जले हुए और अध-जले 500 रुपये के नोटों के बंडल बरामद हुए थे।
  • ​ इस घटना के बाद, मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश द्वारा एक इन-हाउस जांच कमेटी का गठन किया गया था। इस कमेटी में तीन न्यायाधीश शामिल थे, जिन्होंने अपनी रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा को कदाचार का दोषी पाया।
  • आरोपों के सामने आने के बाद, जस्टिस वर्मा का दिल्ली हाई कोर्ट से उनके मूल हाई कोर्ट, इलाहाबाद हाई कोर्ट में तबादला कर दिया गया था।
  • जस्टिस वर्मा ने इस इन-हाउस जांच रिपोर्ट और अपने खिलाफ महाभियोग की सिफारिश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। उन्होंने तर्क दिया था कि जांच प्रक्रिया में नियमों का पालन नहीं किया गया और उन पर लगे आरोप झूठे हैं।
  • ​सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा की याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि उनके खिलाफ की गई जांच प्रक्रिया और सिफारिश सही है। कोर्ट ने यह भी कहा कि जस्टिस वर्मा का आचरण “आत्मविश्वास को प्रेरित नहीं करता।”

महाभियोग(Impeachment)क्या है?

महाभियोग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी उच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को उसके पद से हटाया जा सकता है। यह प्रक्रिया भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों को हटाने के लिए अपनाई जाती है।
​महाभियोग की प्रक्रिया (जजों के लिए)
​भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(4) में सुप्रीम कोर्ट के जजों को हटाने की प्रक्रिया दी गई है, जो अनुच्छेद 218 के तहत हाई कोर्ट के जजों पर भी लागू होती है। यह प्रक्रिया ‘न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968’ के अनुसार चलती है।

  • ​प्रस्ताव की शुरुआत:
  1. किसी जज को हटाने का प्रस्ताव लोकसभा या राज्यसभा में लाया जा सकता है।
  2. लोकसभा में प्रस्ताव लाने के लिए कम से कम 100 सदस्यों और राज्यसभा में 50 सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए।
  3. यह प्रस्ताव तब आगे बढ़ सकता है जब इसे लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) या राज्यसभा के सभापति (Chairman) द्वारा स्वीकार किया जाए। वे इस प्रस्ताव को अस्वीकार भी कर सकते हैं।
  • जांच समिति का गठन:
  1. यदि प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है, तो अध्यक्ष या सभापति एक तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन करते हैं।
  2. सुप्रीम कोर्ट के एक जज (या भारत के मुख्य न्यायाधीश)।
  3. किसी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश।
  4. एक प्रसिद्ध विधिवेत्ता (eminent jurist)।
  5. यह समिति आरोपों की गहन जांच करती है।
  • ​समिति की रिपोर्ट:
  1. समिति अपनी जांच के बाद एक रिपोर्ट प्रस्तुत करती है।
  2. यदि समिति जज को दोषी पाती है, तो यह प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में रखा जाता है।
  • ​संसद में मतदान:
  1. प्रस्ताव को दोनों सदनों में अलग-अलग पारित करना होता है।
  2. इसे पारित करने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है, जिसका अर्थ है:
  3. सदन के कुल सदस्यों का बहुमत (majority of the total membership)।
  4. सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत (two-thirds majority of those present and voting)।
  • ​राष्ट्रपति का आदेश:
  1. दोनों सदनों से पारित होने के बाद, प्रस्ताव को राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है।
  2. राष्ट्रपति के आदेश के बाद ही जज को उसके पद से हटाया जाता है।
    विदित हो कि भारत के किसी भी न्यायधीश पर अब तक महाभियोग नहीं लगाया गया है…..

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